➤ सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल अकेले मानसिक क्रूरता नहीं, लेकिन वैवाहिक दायित्वों से दूरी और अपमानजनक व्यवहार के साथ हो तो असर पड़ सकता है
➤ पालमपुर पारिवारिक न्यायालय ने पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर पत्नी के कथित व्यवहार को मानसिक क्रूरता माना
➤ अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए कहा- सोशल मीडिया पर रोक नहीं, लेकिन रिश्ते पर प्रतिकूल असर पड़ने पर परिस्थितियों का न्यायिक मूल्यांकन संभव
पालमपुर। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर पारिवारिक न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद में पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की है। अदालत ने मामले में पत्नी के कथित व्यवहार और वैवाहिक जीवन से जुड़े विभिन्न तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए उसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में माना। अदालत ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि केवल सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। जब इसके साथ वैवाहिक जिम्मेदारियों से दूरी, लगातार विवाद, जीवनसाथी के प्रति अपमानजनक व्यवहार और अन्य परिस्थितियां जुड़ जाएं, तभी पूरे मामले को मानसिक क्रूरता के नजरिए से देखा जा सकता है।
अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश धीरू ठाकुर की अदालत ने फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता के अधिकार को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की सोशल मीडिया गतिविधियों पर महज इस आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती कि वह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अधिक करता है। हर व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता है। लेकिन जब सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल वैवाहिक जिम्मेदारियों और दांपत्य संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगे और उसके साथ लगातार विवाद तथा जीवनसाथी के प्रति तिरस्कारपूर्ण या अपमानजनक व्यवहार भी सामने आए, तो इन सभी परिस्थितियों का न्यायिक मूल्यांकन किया जा सकता है।
2024 में पति ने दायर की थी तलाक की याचिका
बैजनाथ उपमंडल निवासी पति ने वर्ष 2024 में पालमपुर पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। पति की ओर से आरोप लगाया गया कि मार्च 2017 से उसकी पत्नी के व्यवहार में बदलाव आना शुरू हुआ। पति के अनुसार, पत्नी लंबे समय तक सोशल मीडिया पर व्यस्त रहने लगी और इसके साथ ही ससुराल में रहने तथा घरेलू और वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने से भी इन्कार करने लगी।
पति ने अदालत के समक्ष यह भी आरोप लगाया कि पत्नी परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के साथ दुर्व्यवहार करती थी। इसके अलावा उसे अनाकर्षक और कमतर बताकर लगातार अपमानित किए जाने का भी आरोप लगाया गया। पति के अनुसार, इस तरह के व्यवहार से दांपत्य जीवन में तनाव बढ़ता गया और दोनों के बीच विवाद लगातार होते रहे।
मामले को सुलझाने के लिए परिवार के स्तर पर भी प्रयास किए गए। रिश्तेदारों और पंचायत स्तर पर दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने तथा रिश्ते में सुधार लाने की कोशिश की गई। हालांकि, इन प्रयासों का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका और वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं हो पाए।
नोटिस के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुई पत्नी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पत्नी को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। हालांकि, नोटिस के बावजूद वह अदालत में उपस्थित नहीं हुई। इसके बाद अदालत ने उसे एकतरफा घोषित कर दिया और उपलब्ध रिकॉर्ड तथा साक्ष्यों के आधार पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई।
अदालत ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों और मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड का मूल्यांकन किया। पत्नी की ओर से अदालत के समक्ष उपस्थित होकर आरोपों का प्रभावी खंडन नहीं किए जाने को भी मामले की परिस्थितियों में देखा गया। इसके बाद अदालत ने वैवाहिक संबंधों में सामने आए विभिन्न पहलुओं का समग्र आकलन करते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की।
घरेलू काम से इन्कार पर भी अदालत की अहम टिप्पणी
फैसले में अदालत ने घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल खाना बनाने या कपड़े धोने जैसे घरेलू काम करने से इन्कार करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। किसी व्यक्ति को घरेलू काम करने के लिए बाध्य करने को अकेले वैवाहिक क्रूरता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यदि घरेलू जिम्मेदारियों से लगातार दूरी बनाने का व्यवहार विवाह संबंध जारी न रखने की मंशा, लगातार विवाद, परिवार के प्रति अनादर और जीवनसाथी के अपमान जैसे अन्य तथ्यों के साथ सामने आता है, तो पूरे मामले की परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में किसी एक घटना को अलग करके नहीं देखा जा सकता। वैवाहिक व्यवहार का समग्र प्रभाव, दोनों पक्षों के बीच संबंधों की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए यह तय किया जाना जरूरी है कि संबंधित आचरण मानसिक क्रूरता की कानूनी सीमा तक पहुंचता है या नहीं।
सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी संतुलन
इस मामले में अदालत की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सोशल मीडिया इस्तेमाल और वैवाहिक अधिकारों के बीच संतुलन को रेखांकित किया गया है। अदालत ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल को अपने आप में गलत या मानसिक क्रूरता नहीं माना। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार वैवाहिक संबंधों में दूसरे पक्ष के अधिकारों और जिम्मेदारियों को पूरी तरह नजरअंदाज करने का आधार नहीं बन सकता।
यानी केवल यह तथ्य कि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताता है, तलाक के लिए पर्याप्त आधार नहीं होगा। लेकिन यदि अत्यधिक सोशल मीडिया इस्तेमाल के कारण वैवाहिक जीवन प्रभावित हो, जिम्मेदारियों से लगातार दूरी बने, दंपती के बीच विवाद बढ़ें और जीवनसाथी के प्रति अपमानजनक या तिरस्कारपूर्ण व्यवहार भी सामने आए, तो इन सभी तथ्यों को एक साथ देखकर अदालत मानसिक क्रूरता के प्रश्न पर निर्णय ले सकती है।
पालमपुर पारिवारिक न्यायालय का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, डिजिटल जीवन और वैवाहिक जिम्मेदारियों के बीच कानूनी संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी वैवाहिक विवाद में सोशल मीडिया का इस्तेमाल अकेला निर्णायक तथ्य नहीं हो सकता, बल्कि उसके साथ जुड़े व्यवहार और रिश्ते पर पड़ने वाले समग्र प्रभाव को भी देखा जाना जरूरी है।



